मैं उसे अश्क़ों में भिगो नहीं सकता।
इसीलियेसामने कभी रो नहीं सकता
टूट कर बिखर गया हूँ तेरे कदमो में
अब इससे ज्यादा तेरा हो नहीं सकता
अमोल
बेटा नाज़ुक़ है तेरी कलाई
तुझे अबतक समझ न आई
छोड़ ये बन्दुक ओ तीर का खेल
ये है फिजूल के जमीर का खेल
अमोल
मेरे अँधेरी मोहब्बत का जुगनू है तू
मैं कैसे बहा दू तुझे मेरे आँसू है तू
किसे समेटू किसे मैं छोड़ू
जबकि जीस्त का हर पहलू है तू
अमोल
न तीर न तलवार दिखा मुझे
दिखाना है तो प्यार दिखा मुझे
तन बदन में इक रक्कासा है मेरे
बस अपना तू खुमार दिखा मुझे
अमोल
दोस्ती के माने गिरने नहीं दूंगा
इतना तुझे कभी उड़ने नहीं दूंगा
मैंने फेला रखा है अपने दामन अमोल
मैं तुझको जमी पे बिखरने नहीं दूंगा
अमोल
आबे हुबाब है पत्थर नहीं होने वाले
हम दीवाने कभी पतझर नहीं होने वाले
अपने दिलो जा में हमें जप्त कर ले
अगर खो गये तो मयस्सर नहीं होने वाले
अदायें रज्जब सी पायी है हमने
बेघर होकर भी बेघर नहीं होने वाले
जो बह गये उन्हें मिला है समन्दर
वो बुत बन गये तर नहीं होने वाले
बक्शी थी जैसी इज़्ज़त औरतो को
साहिर की तरह अब शाइर नहीं होने वाले
जो जेवर है तेरे जज़्बए दिल के अमोल
वो हरगिज़ जिंदगी से बाहर नहीं होने वाले
🐾अमोल🐾
आबे हुबाब=पानी का बुलबुला
मयस्सर=उपलब्ध
रज़्ज़ब=एक संत