मेरे जज़्बात वो समझा नहीं है
वो मेरा होके भी मेरा नहीं है
जो मुझसे रातभर करता है बाते
मगर उसने मुझे देखा नहीं है
वो अपनी छत पे मैं अपनी हूँ छत पे
कोई हम दोनों में तन्हा नहीं है
तू नज़दीक इतनी बेताबी से न आ
हमारे बीच क्या दुनिया नहीं है
नहीं होगी हँसी गहराईयो सी
के जिनकी आँखों में दरिया नहीं है
अमोल जज्बातो की खामोशियो में
क्यू लफ़्ज़े मोहब्बत लिखता नहीं है
🌹अमोल🌹