ठगी का नया हथकंडा है Facebook का Free Basics
By:मुकेश कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार
दुनिया में सिर्फ़ वही लोग ठगे जाते हैं, जो लालची होते हैं. जो जितना बड़ा लालची होगा, उतना ज़्यादा ठगा जाएगा! यही सर्वथा सत्य यानी Universal Truth है. इसीलिए रातों-रात मालामाल बनने का ख़्वाब देखने वाले सिर्फ़ येन-केन-प्रकारेण औरों को ठगने की तरक़ीबें ही सोचते रहते हैं. ऐसा ही सयाना ठग है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का वो युवा दोस्त, जिसने अमेरिका में इन्टरव्यू लेते वक़्त मोदी को रुला दिया था. वही मार्क ज़ुकरबर्ग अब भारतवासियों को रुलाकर अपना उल्लू सीधा करने की फ़िराक़ में है! अपनी साज़िश को अंज़ाम देने के लिए ज़ुकरबर्ग के फ़ेसबुक ने रिलायंस नेटवर्क को अपना पार्टनर बनाया है. ठगी के इनके नये हथकंडे का नाम है Free Basics! ये ‘मुँह में राम बगल में छुरी’ जैसा है.
‘फ्री बेसिक्स’ की बुनियाद में ही झाँसा है. ये ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ के सारे उसूलों की धज़्ज़ियाँ उड़ाकर लोगों को मुफ़्त इंटरनेट देने की बात करता है. लेकिन इसका मकसद इंटरनेट डाटा के धन्धे पर एकाधिकार करके ख़ुद को मालामाल करना है. पूरी योजना ‘मुफ़्त’ की आड़ में लोगों को उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा करने की है. ये उस मार्क ज़ुकरबर्ग की तरक़ीब है जो जन्मजाम Colour Blind है. यानी उसकी आँखें सामान्य लोगों की तरह रंगों को नहीं पहचान पातीं. लेकिन वो बेईमानी के रंगों का शातिर खिलाड़ी है. उसकी कम्पनी फ़ेसबुक ने रिलायंस नेटवर्क के साथ मिलकर इंटरनेट को ऐसे बन्धक बनाने की साज़िश रची है जो ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ के चक्रव्यूह को तोड़ देगा.
‘फ्री बेसिक्स’ एप्लीकेशन के ज़रिये रिलायंस के ग्राहकों को उन इंटरनेट साइट्स की मुफ़्त सेवाएँ मिलेंगी जो एप से जुड़े होंगे. ऐसी चुनिन्दा वेबसाइट्स पर जाने पर ग्राहक को कोई डाटा ख़र्च नहीं भरना पड़ेगा. फ़िलहाल, फ़ेसबुक इसे मुफ़्त बता रहा है. लेकिन वो ये नहीं कह रहा कि ये हमेशा मुफ़्त ही रहेगा. सारा पेंच इसी बात में है. मक़सद, मुफ़्त की बात करके चोर दरवाज़े से ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ को नष्ट करना है. ताक़ि ज़्यादा से ज़्यादा डाटा का धन्धा मुट्ठी में आ जाए. फ़ेसबुक हमें ये कहकर बरगला रहा है कि वो भारत में उन लोगों तक इंटरनेट पहुँचाना चाहता है जो इसके महँगे डाटा का ख़र्च नहीं उठा सकते. लेकिन ये सच नहीं हो सकता. क्योंकि टेलिकॉम ऑपरेटर्स की क़रीब 20% कमाई डाटा से है.
अभी ‘फ्री बेसिक्स’ के तहत ग्राहकों को जो डाटा मुफ़्त में दिया जाएगा वो सिर्फ़ प्रमोशनल है. आगे चलकर इस प्रचार के ख़र्च की भरपायी उन्हीं कम्पनियों से की जाएगी जो ‘फ्री बेसिक्स’ का हिस्सा बनेंगी. आशंका है कि ‘फ्री बेसिक्स’ से होने वाले राजस्व नुकसान की भरपायी के लिए टेलीकॉम ऑपरेटर्स अपनी सेवाओं को और महँगा कर देंगे. सीधी बात है कि कोई भी धन्धा, भला मुफ़्त में कैसे चल सकता है! कोई न कोई तो ‘मुफ़्त’ का बोझ उठाएगा. इसीलिए ‘फ्री बेसिक्स’ सीधे-सीधे ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ के ख़िलाफ़ होगा.
इसे यूँ समझिए कि इंटरनेट पर किसी सामान को पाँच कम्पनियाँ बेचती हैं. लेकिन यदि उसमें से दो ही ‘फ्री बेसिक्स’ से जुड़ी हैं तो इन्हीं दो कम्पनियों तक ग्राहक की पहुँच मुफ़्त में होगी. बाक़ी तीन कम्पनियाँ या तो प्रतिस्पर्धा से बाहर होंगी या उन्हें भी अपना कारोबार बचाने के लिए ‘फ्री बेसिक्स’ से ही जुड़ना होगा. जुड़ने के लिए आगे चलकर कम्पनियाँ फ़ेसबुक को रुपये देंगी. जिसे वो टेलीकॉम ऑपरेटर्स के साथ बाँट लेगा. अभी धन्धे को ज़माने के लिए फ़ेसबुक और रिलायंस ने ‘फ्री बेसिक्स’ पर इस्तेमाल होने वाला डाटा को मुफ़्त देने की पेशकश की है. ‘फ्री बेसिक्स’ का मक़सद ज़्यादा से ज़्यादा डाटा बाज़ार को अपनी मुट्ठी में करना है. इसीलिए फ़ेसबुक ने ‘फ्री बेसिक्स’ की गाइड लाइन्स को किसी भी वक़्त बदलने का अधिकार अपने पास ही रखा है.
वैसे मुफ़्त इंटरनेट सर्विस देने के अन्य मॉडल्स भी सफल रहे हैं. इसमें ग्राहक को कुछ विज्ञापनों को देखने के बदले मुफ़्त इंटरनेट एक्सेस मिलता है. इससे ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ की अनदेखी नहीं होती. फ़ेसबुक का ये दावा भी खोखला है कि ‘फ्री बेसिक्स’ की बदौलत ज़्यादा से ज़्यादा लोग इंटरनेट से जुड़ सकेंगे. भारत में ‘फ्री बेसिक्स’ के बग़ैर ही इंटरनेट सेवाओं का काफ़ी तेज़ी से विस्तार हो रहा है. 2015 में ही देश में 10 करोड़ नये इंटरनेट ग्राहक बढ़े हैं. इसमें ‘फ्री बेसिक्स’ का कोई योगदान नहीं है.
‘फ्री बेसिक्स’ सर्विस को फ़ेसबुक ने पहले internet.org के नाम से लॉन्च किया था. लेकिन जब तमाम विशेषज्ञों ने इसे ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ के ख़िलाफ़ बताया. तब फ़ेसबुक ने इसका नाम बदलकर ‘फ्री बेसिक्स’ कर दिया. इसमें फ्री शब्द का इस्तेमाल भारतीयों को झाँसा देने के लिए हुआ है. बीते अक्टूबर में फ़ेसबुक और रिलायंस कम्यूनिकेशंस ने इसे एक एप्लीकेशन के ज़रिये चालू किया. फिर इसकी कलई खुली तो मामला ट्राई के पास जा पहुँचा. ट्राई ने ढुलमुल नीति अपनायी. उसने कहा कि ये जानना ज़रूरी है कि क्या भारतीय ग्राहक ‘फ्री बेसिक्स’ को अपनाना चाहेंगे? जबकि ट्राई को सिर्फ़ इतना तय करना था कि ‘फ्री बेसिक्स’ से ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ का उल्लंघन होता है. फ़िलहाल, ट्राई ने रिलायंस को 31 दिसम्बर तक ‘फ्री बेसिक्स’ को निलम्बित रखने का आदेश दिया है.
‘फ्री बेसिक्स’ पर रोक लगने के बाद फ़ेसबुक ने इसके लिए, अपने भारतीय सदस्यों से समर्थन जुटाने के लिए एक फ़रेबी अभियान चलाया. इसके तहत फ़ेसबुक ने हफ़्ते भर में ‘Save Free Basics’ अभियान के तहत अपने प्रारूप पर ईमेल के ज़रिये डिज़ीटल हस्ताक्षर करवाकर उसे भारतीय दूरसंचार नियामक (ट्राई) के सामने रखा. फ़ेसबुक के 13 करोड़ भारतीय सदस्यों में से सिर्फ़ 32 लाख ने इसका साथ दिया. हालाँकि, प्रारूप के तथ्य भी भ्रष्ट और बोझिल थे. ये भी झाँसा ही था. इससे ‘फ्री बेसिक्स’ पर लगी रोक को फ़ेसबुक हटवाना चाहता है. इसके लिए रिलायंस के गुर्गे भी मोदी सरकार में सर्वोच्च स्तर तक लॉबिंग कर रहे हैं. अब ट्राई को ये तय करना है कि इंटरनेट की आत्मा ही उसकी स्वतंत्रता है.
दूसरी ओर, इंटरनेट की दुनिया पर राज करने वाली फ़ेसबुक, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, याहू जैसी कम्पनियों का मुख्य कारोबार ही ज़्यादा से ज़्यादा डाटा हथियाने के सिद्धान्त पर टिका है. इसे डाटा का जमावड़ा (Aggregation) कहते हैं. इसी जमावड़े से ये भारी-भरकम कम्पनियाँ अपने इंटरनेट प्लेटफ़ॉर्म के प्रति विज्ञापनदातों को रिझाते हैं. फ़ेसबुक ने भी WhatsApp, Instagram जैसी पचासों कम्पनियों को इसीलिए समय-समय पर ख़रीदा है, ताक़ि ‘डाटा के जमावड़े’ में उसकी तूती बोलती रहे. हालाँकि ताज़ा शिगूफ़ा जिस ‘फ्री बेसिक्स’ का है उसके तहत न तो ग्राहक मुफ़्त में वीडियो देख सकता है, न ही वीडियो कॉल कर सकता है, न अच्छी क्वालिटी वाली तस्वीरों को देख सकता है और न ही बैंकिंग वग़ैरह से जुड़ी सुरक्षित (Secure) साइट्स पर जा सकता है. यही नहीं, ‘फ्री बेसिक्स’ के ज़रिये आप अपनी बेवसाइट में भी किसी कंटेट को बदल नहीं सकते. इसीलिए ये मुफ़्त के नाम पर होने वाली ठगी है.
अब यदि हम भारतीयों के इंटरनेट इस्तेमाल के तरीक़े पर ग़ौर करें तो पाएँगे कि यहाँ 78 फ़ीसदी अपनी स्थानीय भाषा में वीडियो देखना पसन्द करते हैं. सस्ते स्मार्ट फ़ोन के प्रसार की वजह से पिछले साल वीडियो के इस्तेमाल हुए डाटा में 127 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा दर्ज़ हुआ! लेकिन ‘फ्री बेसिक्स’ से इस तबक़े को कोई फ़ायदा नहीं मिलेगा. साफ़ है कि ‘फ्री बेसिक्स’ का सारा पैंतरा ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ को ठेंगा दिखा रहा है. इससे निज़ात दिलाने का सारा दारोमदार ट्राई पर है. लेकिन उसे टेलीकॉम ऑपरेटर्स ने अपनी मुट्ठी में कर रखा है. वो ग्राहकों के हित में कोई फ़ैसला नहीं ले पाता. इसलिए ग्राहकों को न तो इंटरनेट के सस्ते डाटा प्लान मिल पा रहे हैं, ना कॉल ड्रॉप की समस्या से छुटकारा और न ही देश में 3जी सेवाओं का विस्तार ही हो पा रहा है. ये आपूर्ति क्षेत्र का हाल है. जबकि माँग क्षेत्र के आंकड़े शानदार हैं. देश में 1 करोड़ इंटरनेट कनेक्शन लगने में जहाँ 10 साल लगे. वहीं 2 करोड़ का सफ़र 3 साल में और 3 करोड़ का आंकड़ा 1 साल में ही तय हो गया. सबको पता है कि हमारी इंटरनेट सेवाएँ बेहद घटिया हैं. ‘फ्री बेसिक्स’ तो हमें और तबाह ही करेगा!